स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अचानक बढ़ी हलचल ने भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। शिप-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, 20 लाख बैरल कुवैती कच्चे तेल से भरा भारतीय झंडे वाला बहुत बड़ा क्रूड कैरियर यानी VLCC 'लीला वदीनार' होर्मुज जलडमरूमध्य में एंट्री करने ही वाला था कि अचानक ओमान के तट से उसे यू-टर्न लेना पड़ा। वजह साफ थी। सुरक्षा की गंभीर चिंताएं और ईरान की बढ़ती आक्रामकता।
ईरान की ओर से तय समुद्री रास्तों का कड़ाई से पालन न करने का आरोप लगाकर भारतीय टैंकर को रास्ता बदलने पर मजबूर किया गया। यह अकेली घटना नहीं है। इससे ठीक पहले कतर से एलएनजी लेकर गुजरात आ रहे एक जहाज पर ड्रोन से हमला हुआ, जिसके बाद उसके इंजन रूम में आग लग गई थी। इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक तेल बाजार में खलबली मचा दी है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या भारत में ईंधन संकट गहराने वाला है।
क्या सचमुच संकट में है आपकी गाड़ी का ईंधन
इस बात को सीधे और व्यावहारिक तरीके से समझने की जरूरत है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है जो इसी होर्मुज के संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। जब लीला वदीनार जैसे विशालकाय जहाज को 20 लाख बैरल तेल के साथ वापस लौटना पड़ता है, तो तात्कालिक तौर पर रिफाइनरियों का गणित गड़बड़ाता है।
मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड ने इराक से क्रूड लोड करने के लिए बुक किए गए एक जहाज का चार्टर तक रद्द कर दिया है। ये फैसले बताते हैं कि कंपनियां इस समय कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि कल से पेट्रोल पंपों पर लाइनें लग जाएंगी।
भारत के पास इस तरह की आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए एक मजबूत स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व यानी SPR सिस्टम है। विशाखापत्तनम, मैंगलोर और पादुर में बने भूमिगत चट्टानी गुफाओं में भारत लाखों टन कच्चा तेल हमेशा सुरक्षित रखता है। यह रिजर्व ऐसी ही किसी बड़ी कूटनीतिक या युद्ध जैसी स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतों को हफ्तों तक पूरा रखने के लिए बनाया गया है। इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है।
होर्मुज में अचानक क्यों बढ़ गया है तनाव
तेहरान लगातार इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपना पूरा कंट्रोल बनाए रखना चाहता है। उसका सीधा दावा है कि वह इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूलेगा। इतना ही नहीं, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने साफ चेतावनी दी है कि अपने तय रूट से थोड़ा भी भटकने वाले जहाजों पर सीधे एक्शन लिया जाएगा।
हाल के दिनों में इस इलाके में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों के बाद ईरान ने अपनी चौकसी और आक्रामकता दोनों बढ़ा दी है। जब अमेरिका ने ईरानी ठिकानों पर हमले किए, तो जवाब में ईरान ने इस रूट को लगभग चोक करने जैसी स्थिति पैदा कर दी। परिणाम हमारे सामने है। व्हाइट हाउस ने ईरान पर नए तेल प्रतिबंध लगा दिए हैं और ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से उछलकर 76 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं।
रिफाइनिंग कंपनियों का नया बैकअप प्लान
अगर आप सोचते हैं कि भारतीय तेल कंपनियां सिर्फ खाड़ी देशों के भरोसे बैठी हैं, तो आप गलत हैं। पिछले कुछ सालों में भारत ने अपने तेल आयात के स्रोतों का बहुत तेजी से विविधीकरण किया है।
रूस से आने वाला सस्ता कच्चा तेल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रूसी तेल जहाजों को होर्मुज के इस खतरनाक रास्ते से गुजरने की जरूरत नहीं होती। इसके अलावा भारत अब अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के देशों से भी कच्चे तेल की खरीदारी बढ़ा रहा है।
जब खाड़ी देशों में ऐसी हलचल होती है, तो भारतीय रिफाइनरियां तुरंत अपने लॉजिस्टिक्स को शिफ्ट करती हैं। बेशक रूट बदलने या दूर के देशों से तेल मंगाने पर भाड़ा थोड़ा बढ़ जाता है, जिससे अंततः तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आता है। लेकिन सप्लाई चेन पूरी तरह टूटने का खतरा बेहद कम रहता है।
क्या आने वाले दिनों में बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम
आम आदमी के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसकी जेब पर इसका क्या असर होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का 76 डॉलर के पार जाना निश्चित रूप से भारतीय तेल कंपनियों के लिए चिंता की बात है। भारत में ईंधन की कीमतें काफी हद तक वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और सरकारी टैक्स स्ट्रक्चर पर निर्भर करती हैं।
फिलहाल सरकारी तेल कंपनियों के पास कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए पर्याप्त वित्तीय कुशन मौजूद है। तुरंत कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम है, लेकिन अगर होर्मुज में यह गतिरोध हफ्तों तक खिंचा, तो खुदरा कीमतों में हल्की बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।
आगे की राह और रणनीतिक कदम
इस पूरे समुद्री तनाव के बीच अब भारत सरकार और तेल कंपनियों को मिलकर कुछ बेहद व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।
सबसे पहले, भारतीय नौसेना के साथ तालमेल बढ़ाकर 'लीला वदीनार' या 'शेनलोंग' जैसे अन्य जहाजों को सुरक्षित एस्कॉर्ट प्रदान करना होगा। कुछ महीने पहले ही भारतीय नौसेना की मदद से कई क्रूड टैंकर सुरक्षित निकले थे, वही रणनीति फिर अपनानी होगी।
दूसरा, कंपनियों को खाड़ी देशों पर अपनी निर्भरता को और कम करते हुए नॉन-हॉर्मुज रूट वाले देशों से तत्काल अतिरिक्त कार्गो बुक करने चाहिए।
तीसरा और सबसे जरूरी काम यह है कि देश के भीतर मौजूद स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व की स्थिति की समीक्षा की जाए ताकि किसी भी आपात स्थिति के लिए देश का बैकअप प्लान पूरी तरह तैयार रहे।