गाज़ा में अपार्टमेंट पर हमला और सीजफायर की जमीनी हकीकत

गाज़ा में अपार्टमेंट पर हमला और सीजफायर की जमीनी हकीकत

कागजों पर सीजफायर चल रहा है लेकिन गाज़ा की जमीन पर बम अब भी बरस रहे हैं। गाज़ा सिटी में एक बार फिर तड़के हवाई हमला हुआ। एक बहुमंजिला अपार्टमेंट मलबे में तब्दील हो गया और सोते हुए लोग हमेशा के लिए सो गए। इज़रायली सेना के इस ताजा हमले में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई है जबकि दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। मरने वालों में मासूम बच्चे और महिलाएं शामिल हैं। यह हमला सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह उस खोखले शांति समझौते का सबूत है जो गाज़ा के आम नागरिकों को सुरक्षा देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

फिलिस्तीनी सिविल डिफेंस एजेंसी के प्रवक्ता महमूद बस्सल ने पुष्टि की है कि तड़के हुए इन हवाई हमलों में से सात लोग रिहायशी इमारतों में मारे गए। एक अन्य व्यक्ति की मौत गाज़ा सिटी के पश्चिम में स्थित अल-शती शरणार्थी शिविर में हुई। गाज़ा के अल-शिफा अस्पताल से मिली जानकारी के मुताबिक कम से कम 15 घायल लोगों का इलाज चल रहा है जिनमें से कई की हालत बेहद नाजुक है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि हमला इतना अचानक था कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

रिहायशी इलाकों को निशाना बनाने के पीछे का तर्क

इज़रायल डिफेंस फोर्सेस (IDF) का हमेशा की तरह दावा है कि वे सिर्फ हमास के लड़ाकों को निशाना बना रहे हैं। इस बार भी सेना ने कहा कि उनके निशाने पर अपार्टमेंट में छिपे दो हमास कमांडर थे। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। जब एक घने बसे हुए पांच मंजिला अपार्टमेंट पर मिसाइल दागी जाती है, तो नुकसान सिर्फ कंक्रीट का नहीं होता।

यह पहली बार नहीं है जब चरमपंथियों को मारने के नाम पर पूरी इमारत को उड़ा दिया गया। संयुक्त राष्ट्र (UN) की कई रिपोर्टों में यह बात सामने आ चुकी है कि गाज़ा जैसे अत्यधिक आबादी वाले क्षेत्र में सटीक हवाई हमले की थ्योरी पूरी तरह फेल है। जब आप रिहायशी ब्लॉक पर बम गिराते हैं, तो आसपास रहने वाले मासूम नागरिक ही उसकी कीमत चुकाते हैं। अल-शिफा अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि उनके पास आने वाले मरीजों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे होते हैं, जिनके शरीर मलबे में दबने से बुरी तरह कुचल चुके होते हैं।


सीजफायर समझौते का सच

पिछले साल अक्टूबर में दोनों पक्षों के बीच एक युद्धविराम (ट्रूश) पर सहमति बनी थी। दुनिया को लगा कि शायद अब खूनखराबा रुकेगा। लेकिन सच्चाई यह है कि यह सीजफायर सिर्फ कागजों तक सीमित है। गाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, शांति समझौते की घोषणा के बाद से अब तक इज़रायल ने गाज़ा में 930 से अधिक लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। संयुक्त राष्ट्र भी इन आंकड़ों को विश्वसनीय मानता है।

समझौते का पहला चरण तो जैसे-तैसे पूरा हुआ। हमास ने कुछ बंधकों को छोड़ा और बदले में इज़रायल ने अपनी जेलों से फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा किया। लेकिन बात जब दूसरे चरण पर आई, तो सब कुछ ठप हो गया। दूसरे चरण के तहत हमास का निशस्त्रीकरण होना था और इज़रायली सेना को धीरे-धीरे गाज़ा से बाहर निकलना था। महीनों बीत चुके हैं, लेकिन इस पर एक इंच भी प्रगति नहीं हुई है।

  • इज़रायल का रुख: पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि उनकी सेना गाज़ा के 70 प्रतिशत हिस्से पर अपना सीधा नियंत्रण बनाए रखेगी।
  • हमास का पलटवार: हमास इसे समझौते का खुला उल्लंघन मान रहा है और छापामार हमले जारी रखे हुए है।
  • बलि का बकरा: इस राजनीतिक और सैन्य खींचतान में हमेशा की तरह गाज़ा के आम नागरिक ही पिस रहे हैं।

नेतृत्व की लड़ाई और बढ़ता तनाव

इस ताजा हमले के पीछे एक क्रूर टाइमिंग भी छिपी है। हाल ही में इज़रायली सेना ने हमास के सैन्य विंग (अल-कस्साम ब्रिगेड) के नए कमांडर मोहम्मद ओदेह को एक हवाई हमले में मार गिराया था। ओदेह ने केवल दो हफ्ते पहले ही कमान संभाली थी, क्योंकि उनके पूर्ववर्ती इज्ज़ अल-दिन अल-हद्दाद को भी इज़रायल ने 16 मई को ढेर कर दिया था। इज़रायल के रक्षा मंत्री इज़रायल काट्ज़ ने ओदेह को 7 अक्टूबर के हमलों का मास्टरमाइंड बताया था।

हमास के शीर्ष नेतृत्व पर हो रहे इन लगातार हमलों ने संगठन को बैकफुट पर धकेल दिया है। अपनी साख बचाने के लिए हमास अब गाज़ा के भीतर अपनी पकड़ और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ, इज़रायल इस दबाव का फायदा उठाकर पूरे क्षेत्र को अपने कंट्रोल में लेना चाहता है। जब भी हमास की तरफ से कोई हरकत होती है, इज़रायल की वायुसेना पूरे रिहायशी इलाके पर कहर बनकर टूट पड़ती है।

अब आगे क्या

गाज़ा में अब कोई भी जगह सुरक्षित नहीं बची है। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र का स्कूल हो, अस्पताल का परिसर हो या आपका अपना घर। अगर आप इस संघर्ष पर नजर रख रहे हैं, तो केवल युद्धविराम की खबरों पर भरोसा करना बंद कीजिए। जमीनी हकीकत जानने के लिए स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल या ह्यूमन राइट्स वॉच की ग्राउंड रिपोर्ट्स को नियमित रूप से पढ़ें। इस संघर्ष का समाधान सैन्य ताकतों के पास नहीं है, यह बात पिछले दो सालों के विनाश ने साबित कर दी है।

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Wei Price

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