रात के सन्नाटे में चीख-पुकार मच जाए, इससे डरावना कुछ नहीं हो सकता। चिली के ला अराउकानिया क्षेत्र में कुछ ऐसा ही हुआ, जब एक बुजुर्गों के आश्रय गृह में आग ने सब कुछ तबाह कर दिया। इस हादसे ने दुनिया भर में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और देखभाल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
घटना पित्रुफ्केन शहर के विला कोमुई सेक्टर की है। स्थानीय समयानुसार रात करीब साढ़े दस बजे अचानक आग भड़क उठी। उस समय उस इमारत के अंदर कुल 26 लोग मौजूद थे, जिनकी देखभाल की जिम्मेदारी सिर्फ एक अकेली नर्स पर थी। कल्पना कीजिए उस भयानक मंजर की, जहां चारों तरफ लपटें थीं और मदद के लिए कोई बड़ा स्टाफ मौजूद नहीं था।
जब चंद मिनटों में सब कुछ खाक हो गया
आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। ड्यूटी पर तैनात उस अकेली नर्स ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। उसने बहादुरी दिखाते हुए 10 बुजुर्गों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, लेकिन बाकी 16 लोगों की किस्मत ने साथ नहीं दिया। वे लपटों और धुएं के बीच फंस गए।
सुबह जब दमकल विभाग और रेस्क्यू टीमों ने मलबा हटाया, तो वहां सिर्फ जली हुई अवस्था में शव मिले। स्थानीय मेयर जैकलीन रोमेरो इंज़ुंजा ने बचाया गया लोगों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया, गनीमत रही कि उनकी हालत गंभीर नहीं थी, लेकिन जिन 16 लोगों ने अपनी जान गंवाई, उनके परिवारों के लिए यह सदमा कभी न भरने वाला घाव बन गया है।
सुरक्षा मानकों पर उठते बड़े सवाल
ऐसी घटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं होतीं, बल्कि यह हमारी व्यवस्था की चूक का नतीजा होती हैं। एक नर्सिंग होम में जहां दर्जनों बुजुर्ग रहते हों, वहां रात के वक्त सिर्फ एक कर्मचारी का होना किस तरह की सुरक्षा प्रणाली को दर्शाता है? क्या हमारे देश और दुनिया के ऐसे संस्थानों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
आग लगने के कारणों की जांच अभी जारी है। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, दमकल की सात गाड़ियों और कई प्रशासनिक टीमों को कड़ी मशककत करनी पड़ी तब जाकर आग पर काबू पाया जा सका। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार किसी बड़ी त्रासदी के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी?
सबक जो हमें कभी नहीं भूलने चाहिए
वृद्धाश्रम या नर्सिंग होम ऐसे स्थान होने चाहिए जहां बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिले। अगर वहां आपातकालीन निकास, आधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम और पर्याप्त स्टाफ की कमी होगी, तो ऐसी त्रासदियां बार-बार दोहराई जाएंगी। सिर्फ जांच बिठा देने से या अस्थायी शेल्टर बना देने से जिंदगियां वापस नहीं लौटतीं। जरूरत इस बात की है कि ऐसे सभी संस्थानों के लिए कड़े नियम बनाए जाएं और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए ताकि किसी और बुजुर्ग को इस तरह की खौफनाक मौत का सामना न करना पड़े।